સુવિચાર….💜

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आप की जिन्दगी के सबसे शानदार लमहे आप के सफल कहे जानेवाले दिन नहीं होते बल्कि वे दिन होते हैं जब मायूसी और नाउम्मिदी आपके भीतर जिन्दगी से दो दो हाथ करने का हौसला पैदा करती है और भविष्य की कामयाबियों का वायदा करती है
✍ गुस्ताव फ्लॉबेयर


जो स्वीकार्य है उससे नहीं, बल्कि जो सही है उससे शुरुआत करो
✍ फ्रांज़ काफ्का


अंतर्दृष्टि-विहीन सक्रियता से अधिक भयंकर कुछ भी नहीं होता
✍ गोयठे


टापू को देख पाने के लिए यह जरूरी है कि आप टापू छोड़ दें, स्‍वयं को देख पाने के लिए आपको अपने आप से आजाद होना पड़ेगा
✍ महमूद दरवेश


अपमान से बिना डरे, मुकुट पाने की बिना लालसा किये, प्रशंसा हो या अपमान दोनों को ही उदासीन ढंग से ग्रहण करो, और कभी किसी मूर्ख से बहस में मत उलझो
✍ पुश्किन


वास्‍तविक बुद्धिमानी सभी चीजों का ज्ञान प्राप्‍त करना नहीं बल्कि यह जानना है कि जीवन में कौन सी चीजें जरूरी हैं, कौन सी कम जरूरी हैं और कौन सी चीजें बिल्‍कुल गैरजरूरी हैं
✍ तोल्‍सतोय


गलत चीजों का गलत होना सिर्फ इसलिए स्‍थगित नहीं हो जाता कि अधिकांश लोग उसे साझा करते हैं
✍ तोल्‍सतोय


हर उस आदमी को जो सच्‍चे मन से यकीन करता है कि स्‍वतन्‍त्रता, सुन्‍दरता और तर्कसंगत जीवन जीने की मानवजाति की आकांक्षा बेकार का सपना नहीं, बल्कि वह असली ताकत है जो जीवन के नये नये रूपों का सृजन कर सकती है, एक ऐसा उत्‍तोलन है जो पूरी दुनिया को उठा सकता है
✍ मक्सिम गोर्की


एकान्‍त अच्‍छी चीज है, पर कोई होना तो चाहिए जो तुम्‍हें यह बात बता सके
✍ बाल्‍जाक


मैं खुद को वसीयत में दे देता हूँ मिट्टी को
घास से उगने के लिए जिसे मैं प्यार करता हूँ
अगर तुम मुझे चाहते हो तो खोजो मुझे
अपने जूतों के तल्लों के नीचे।
✍ वाल्ट व्हिटमन (‘लीव्स ऑफ़ ग्रास’)


तुम स्मृतियों को छुपा सकते हो, लेकिन उस इतिहास को कैसे मिटा सकते हो जिसने उन्हें पैदा किया है!
✍ हारुकी मुराकामी


एक दिल दूसरे दिल से सिर्फ़ सामंजस्य के जरिये ही नहीं जुड़ा होता है। बल्कि वे अपने ज़ख्मों के जरिये गहराई से जुड़े होते हैं। दर्द से जुड़ा दर्द, कमज़ोरी से जुड़ी कमज़ोरी। पीड़ा की एक चीख के बिना कोई चुप्पी नहीं, रक्तपात के बिना कोई क्षमाशीलता नहीं, गंभीर क्षति के गलियारे से गुजरे बिना कोई स्वीकरण नहीं। सच्चे सामंजस्य की जड़ में यही चीज़ होती है।
✍ हारुकी मुराकामी


“क्या होता है जब लोग अपना दिल खोल देते हैं?”
“वे बेहतर हासिल करते हैं!”
✍ हारुकी मुराकामी

दुनिया के मजदूरो एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवाय कुछ नहीं है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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क्रांतियां इतिहास का इंजन होती हैं।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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पिछले सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)

धार्मिक व्यथा एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों ही है। धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह (उच्छ्वास) है, निर्दय संसार का मर्म है तथा साथ ही निरुत्साह परिस्थितियों का उत्साह भी है। यह जनता की अफ़ीम है।
कार्ल मार्क्‍स  (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)


पूंजीवादी समाज में पूँजी स्वतंत्र और व्यक्तिगत है , जबकि जीवित व्यक्ति आश्रित है और उसकी कोई वैयक्तिकता नहीं है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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बहुत सारी उपयोगी चीजों के उत्पादन का परिणाम बहुत सारे बेकार लोग होते हैं।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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अमीर गरीब के लिए कुछ भी कर सकते हैं लेकिन उनके ऊपर से हट नहीं सकते।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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कारण हमेशा से अस्तित्व में रहे हैं , लेकिन हमेशा उचित रूप में नहीं।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)


हर युग के शासक विचार शासक वर्ग के विचार होते हैं, यानी जो वर्ग समाज की शासक भौतिक शक्ति है, वही समाज की शासक बौद्धिक शक्ति भी होता है। जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं, वही मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है, जिसके नतीजे के तौर पर, आम तौर पर कहें तो वे लोग जिनके पास मानसिक उत्पादन के साधन नहीं होते हैं, वे शासक वर्ग के अधीन हो जाते हैं।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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जबकि कंजूस मात्र एक पागल पूंजीपति है, पूंजीपति एक तर्कसंगत कंजूस है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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जितना अधिक श्रम का विभाजन और मशीनरी का उपयोग बढ़ता है, उतना ही श्रमिकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढती है, और उतनी ही उनका वेतन कम होता जाता है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)


समाज व्यक्तियों से मिलकर नहीं बनता है बल्कि उनके अंतर्संबंधों का योग होता है, इन्हीं संबंधों के भीतर ये व्यक्ति खड़े होते हैं।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)

जीने और लिखने के लिए लेखक को पैसा कमाना चाहिए, लेकिन किसी भी सूरत में उसे पैसा कमाने के लिए जीना और लिखना नहीं चाहिए।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)



सामाजिक प्रगति को महिलाओं की सामाजिक स्थिति से मापा जा सकता है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)

साम्यवाद के सिद्धांत को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है: निजी संपत्ति को समाप्त करो।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)



पूंजी मृत श्रम है जो पिशाच की तरह है, जो केवल श्रम चूसकर ही जिन्दा रहता है और जितना अधिक जीता है उतना श्रम चूसता है।
कार्ल मार्क्‍स (5 मई 1818 – 14 मार्च 1883)
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सबकूच पहले से ही लिखा है तो पाप और पुण्य हो ही नही सकता…