Revolutionary movement


बाज़ार…..
_कविता कृष्‍णपल्‍लवी*

बाज़ार हमें खुश रहने का आदेश देता हैI
मौतों, युद्धों, अभावों, भुखमरी, और संगीनों के साये तले
बाज़ार हमें खुशियाँ ख़रीदने के लिए उकसाता हैI
बाज़ार एक मसीहा का चोला पहनकर हमें हमारी ज़िंदगी के
अँधेरों से बाहर खींच लाने का भरोसा देता हैI
बाज़ार हमें शोर और चकाचौंध भरी रोशनी की ओर बुलाता हैI
बाज़ार हमें हमारी पसंद बताता है
और बताता है कि सबकुछ ख़रीदा और बेचा जा सकता हैI
.
हम बहुत सारी चमकदार और जादुई चीज़ें खरीदते हैं
और लालच, हिंसा, स्वार्थपरता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्द्धा
और ढेर सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ
उनके साथ-साथ घर चली आती हैंI
.
कुछ लोग बाज़ार में बेचते हैं अपना हुनर,
कुछ काम करने की क़ूव्वत,
कुछ अपनी ज़रूरी चीज़ें,
कुछ अपनी स्मृतियाँ, स्वप्न और कल्पनाएँ
और कुछ लोग अपनी आत्माI
.
बाज़ार पुरस्कृत करता है कवियों-कलाकारों-शिल्पियों को,
बाज़ार समाज-सेवियों को समाज-सेवा के लिए
मुक्त-हस्त मदद करता है और इसतरह
एक मानवीय चेहरा हासिल करता है
बाज़ार-विस्तार की नयी संभावनाओं के साथ-साथI
बाज़ार अपने जादू के जोर से कोई भी चीज़ कहीं
बेच सकता है जैसेकि कुत्ता-मंडी में कला
सूअरों के मेले में समाज-सेवा
और बैलों के हाट में बुद्धिमत्ता !
बाज़ार को जब दिखाना होता है कि वही है मानवता का भविष्य
और मुक्ति की सारी संभावनाएँ उसी की चौहद्दियों में क़ैद हैं
तो वह पूँजी की पतुरिया को
समाजवाद के परिधान पहनाकर उसके साथ
मधुयामिनी मनाने लगता हैI
.
हर रौशन बाज़ार के पीछे
गहन अँधेरे का एक विस्तार होता है
नीम उजाले के पैबन्दों से भरा हुआ
जहाँ बाज़ार में अपनी हड्डियाँ और खून बेचकर
लौटे हुए गुलाम पनाह लिए होते हैं,
जहाँ नदियाँ सूखती होती हैं,
धरती के नीचे पानी में ज़हर घुलता रहता है,
ग्लेशियर सिकुड़ते होते हैं ,
पशु-पक्षियों की अनगिन प्रजातियाँ विलुप्त होती रहती हैं,
जंगल कटते होते हैं और
खेत बंजर होते जाते हैंI
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ચિત્ર:- સોશ્યલ મીડિયા માંથી સાભાર

कविता – कानून
_गोरख पाण्डेय

लोहे के पैरों में भारी बूट
कन्‍धे से लटकती बन्दूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डालकर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायाधीश की, ग़लत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा

मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए ख़ून की
कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बनकर समा जायेगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटायेगा
तो फिर समझिये कि आपका
पता नहीं चल पायेगा
खबरों में इसे मुठभेड़ कहा जायेगा

पैदा होकर मिल्कियत की कोख से
बहसा जायेगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमकाकर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जायेगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जायेगा। Copy pest
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लेनिन ज़िन्दाबाद__बर्तोल्त ब्रेख्त
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पहली जंग के दौरान
इटली की सानकार्लोर जेल की अन्धी कोठरी में
ठूँस दिया गया एक मुक्ति योद्धा को भी
शराबियों, चोरों और उच्चकों के साथ।
ख़ाली वक़्त में वह दीवार पर पेन्सिल घिसता रहा
लिखता रहा हर्फ़-ब-हर्फ़ –
लेनिन ज़िन्दाबाद!
ऊपरी हिस्से में दीवार के
अँधेरा होने की वजह से
नामुमकिन था कुछ भी देख पाना
तब भी चमक रहे थे वे अक्षर – बड़े-बड़े और सुडौल।
जेल के अफ़सरान ने देखा
तो फौरन एक पुताई वाले को बुलवा
बाल्टी-भर क़लई से पुतवा दी वह ख़तरनाक इबारत।
मगर सफ़ेदी चूँकि अक्षरों के ऊपर ही पोती गयी थी
इस बार दीवार पर चमक उठे सफ़ेद अक्षर:
लेनिन ज़िन्दाबाद!

तब एक और पुताई वाला लाया गया।
बहुत मोटे ब्रश से, पूरी दीवार को
इस बार सुर्ख़ी से वह पोतता रहा बार-बार
जब तक कि नीचे के अक्षर पूरी तरह छिप नहीं गये।

मगर अगली सुबह
दीवार के सूखते ही, नीचे से फूट पड़े सुर्ख़ अक्षर –
लेनिन ज़िन्दाबाद!

तब जेल के अफ़सरान ने भेजा एक राजमिस्त्री।
घण्टे-भर वह उस पूरी इबारत को
करनी से खुरचता रहा सधे हाथों।
लेकिन काम के पूरा होते ही
कोठरी की दीवार के ऊपरी हिस्से पर
और भी साफ़ नज़र आने लगी
बेदार बेनज़ीर इबारत –
लेनिन ज़िन्दाबाद!

तब उस मुक्तियोद्धा ने कहा,
अब तुम पूरी दीवार ही उड़ा दो!
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हंजूरी*
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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काम न मिलने पर
अपने तीन भूखे बच्चों को लेकर
कूद पड़ी हंजूरी कुएं में
कुएं का पानी ठण्डा था।

बच्चों की लाश के साथ
निकाल ली गयी हंजूरी कुंए से
बाहर की हवा ठण्डी थी।

हत्या और आत्महत्या के अभियोग में
खड़ी थी हंजूरी अदालत में
अदालत की दीवारें ठण्डी थीं।

फिर जेल में पड़ी रही हंजूरी
पेट पालती
जेल का आकाश ठण्डा था।

लेकिन आज जब वह जेल के बाहर है
तब पता चला है

कि सब कुछ ठण्डा ही नहीं था –
सड़ा हुआ था
सड़ा हुआ है
सड़ा हुआ रहेगा।

कबतक?
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_हबीब जालिब की नज्‍म दस्तूर________________________
(दस्तूर =संविधान)

दीप जिसका महल्लात (महलों) ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साए में हर हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार (फाँसी का तख़्ता) से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ (जेल) की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर

मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता__________________

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
✍अवतार सिंह पाश
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श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है
सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
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केदारनाथ अग्रवाल
वह जन मारे नहीं मरेगा

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

अमन ए आलम की खातिर जंग युगों से जारी है
असलम हबीब।
किसी के पैरो में पड़कर प्रतिष्ठा पाने के बजाय अपने पैरों पर चलकर कुछ बनने की ठान लो।
अपने पैरों पर खड़े होकर मरना घुटने टेक कर जीने से कहीं बेहतर है।
शुरुआत तो कोई भी कर लेता है असली योद्धा तो वही है जो अंजाम तक लड़े।
यदि अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर रहै तो समझो कि आप एक गुलाम हो।
हक़ की बात बोलने के लिए कलेजा चाहिए। तलवे चाटने के लिए एक जीभ ही काफी है।
विज्ञान हक़ है सर उठा कर लिया जाता है। आस्था ओर अकीदा भीख है। सर जुकाकर लिया जाता है।
मुश्किलें हमेशा बहेतरीन लोगों के हिस्से में आती है। क्यों कि वे लोग ही उसे बहेतरीन तरीके से अंजाम देने की क्षमता रखते है।

સ્ટેન સ્વામી એટલે કોણ?